मम्मी पापा , आपका आशीर्वाद यूं ही बना रहे !!

कल की रात शायद ज़िन्दगी की उन चंद बेहतरीन यादों में कैद होगी जिनका कैनवास कितना भी छोटा हो , तस्वीर हमेशा बड़ी ही नज़र आती है। और यकीन मानिये उस हाई डेफिनेशन तस्वीर के ज़रिये ना जाने अगले कितने दिनों तक आप खुश रह पाते हैं। कल भी यही हुआ। दोपहर तक मुझे बहुत अच्छी तरह से याद था कि कल मम्मी पापा की वैवाहिक वर्षगाँठ है और शाम को मुझे कुछ ना कुछ करना है। कुछ करना है से मेरा अभिप्राय ये कत्तई नहीं है की बेहद शानदार पार्टी करी जाए या उनकी पसंद के नाम पर अपनी ख्वाहिशें पूरी कर ली जाएँ।

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यकीन मानिये , मम्मी पापा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक मात्र ऐसे व्यक्तित्व हैं जो किसी चीज़ से इतने प्रसन्न नहीं होते जितना आपके एक फ़ोन कॉल से हो जाते हैं। और फ़ोन की बात चली है तो एक किस्सा सुना देता हूँ जिससे आपको ये विश्वास हो जाए कि मैं फ़ोन कॉल को इतना महत्व क्यों दे रहा हूँ। मेरे पूरे फ्रेंड सर्किल में यदि सब किसी चीज़ से डरते हैं तो वो है मेरे पापा मम्मी का फ़ोन। और कारण सुनियेगा तो अचम्भा भी हो सकता है। पापा के फ़ोन के साथ ही अक्सर पीछे से कुछ आवाज़ों को सुनने का आदि हो गया हूँ। मसलन “गया एक घंटा” “अब तो फ़ोन कल ही कटेगा ” आदि। कभी कभी गर्व होता है कि अच्छा है ना , कहीं अन्यत्र वक़्त बिताने से तो लेकिन साथ साथ बेहद डर भी लगता है कि पापा मम्मी की हर एक बात के साथ एक साहसिक ज़िम्मेदारी भी जन्म ले रही होती है और उसका निर्वाह करना समान्तर धर्म है।

विवाह की वर्षगाँठ सिर्फ मम्मी पापा के लिए नहीं होती अपितु वो होती है हम सब के लिए। जीवन का मतलब समझने के लिए , खुशियों का रहस्य खोजने के लिए , एक दूसरे के प्रति समर्पित होने के लिए और जीवन में जब भी कभी प्रेरणा का स्त्रोत नज़र ना आये , तो वो स्त्रोत समझने के लिए। लिखने बैठूंगा तो शायद उम्र बुरा मान जायेगी क्यूंकि जितना बाहर है उससे कही ज्यादा अंदर है और उस आतंरिक प्रेरणा के दम पर ही अडिग जीवन जीने का सहस जन्म लेता है।

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कहने के लिए बात इतनी सी है कि मम्मी पापा आपको वैवाहिक वर्षगाँठ की हार्दिक शुभकामनाएं , और आपसे ज्यादा हमको ( यानी मान्या , सुधांशु और मैं ) क्यूंकि कहने के लिए शायद अजीब लगे लेकिन यदि आप दोनों परिजनों के रूप में हमें ना मिलते ना , तो जीवन के इन रंगो से हम वाकिफ ही नहीं हो पाते। प्रतिज्ञा , प्रण , वादे , विश्वास के कहीं ऊपर , दरअसल बहुत ज्यादा ऊपर रहना सिखाया है आपने और इस काबिल भी बनाया है कि जीवन में जिस छोर पर भी खतरा नज़र आये तो उस छोर से घर को लौटने का रास्ता सदैव आँखों के सामने हो।

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आपके जीवन में संतुष्टि और खुशियों का प्रवाह इसी तरह से बहता रहे और हम बच्चे , सदैव की भांति आपके आशीर्वचनो से ओतप्रोत रहें।

ढेर सारे प्यार के साथ , आपको वर्षगाँठ की एक बार पुनः बधाई।

मन से ,

मनु !!

 

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चाय की चुस्कियों में काम का मज़ा !!

मैं यदि खुद को सम्पूर्ण युवा वर्ग का प्रतिनिधि समझूँ और वक़्त के पैमानों पर बात करूँ , तो सुबह की पहली पंक्ति की घड़ियाँ हमे दिखाई नहीं देती और रात को लेट सोने को मुख्य कारण बना कर मैं अपनी मूर्खता को सभ्यता सिद्ध भी कर दूँ तब भी मन के एक कोने में कहीं दबी हुई , छिपी हुई इच्छा जरूर होती है , किसी दिन सुबह का सूरज देखने की। पिछले कुछ वर्षों से इसे यूट्यूब का साहस कहिये या इंटरनेट पर हमारी दयादृष्टि कि हमने बड़े स्वाभाविक रूप से सुबह को अलविदा कह दिया है और अब तो शायद भूलने भी लगे हैं। गुडमॉर्निंग जैसे शब्द अब हमारे लिए अस्तित्व नहीं रखते। हमारी सुबह गुड आफ्टरनून से शुरू होती है और सुबह तीन – चार बजे व्हाट्सप्प को गुड मॉर्निंग बोलकर हम सो जाते हैं।

 

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ऐसे में चाय की बात करना बेमानी ही होगी ना !! क्यूंकि चाय का जितना गहरा सम्बन्ध सुबह से है उतना शायद हमारा अपने आप से भी नहीं है। लेकिन फिर भी दिन में एक आध चाय हो भी जाए तो ये मान लेना चाहिए दिन पूरा हो गया। बचपन से सुनता आया हूँ की वक़्त की कदर नहीं करोगे तो वक़्त तुम्हारी कदर नहीं करेगा और शायद हमने इस वाक्य को अपने ईगो पे ले लिया और हर वक़्त, वक्त को पछाड़ने में इस तरह से लग गए कि कब वक़्त पीछे छूट गया , मालूम नहीं। और हाँ , वक़्त और हमारे बीच के इस अन्तर से कत्तई ये मत समझियेगा की हमने काम करना छोड़ दिया है। वो क्या है ना , अब हम चार – पांच चाय एक साथ पी लेते हैं , और बचे हुए काम के लिए गूगल बाबा की शरण में चले जाते हैं। बाकी तो अंदाजा लगा लीजिये कि कौन ज्यादा काम करता हैं , हम या चाय ??

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कलात्मकता को छींक कहके जस्टिफाई करना सबसे बड़ी कला है।

गली नंबर चार, राजा पार्क जयपुर। यही कोई साढ़े सात बज रहे होंगे। औपचारिक रूप से हम सब के लेट के होने का कारण भारी ट्रैफिक के नाम हो गया था। ऐसी में पहली बार हमारे वेन्यू “थड़ी – द टी लाउन्ज ” खोजने में विशाल पंवार जी को ज़रा दिक्कत महसूस हो रही थी। चूँकि वे जोधपुर से हैं और राजा पार्क के बारे में पूर्णतः अवगत नहीं है इसलिए ये होना लाज़मी था। खैर हमारी फ़ोन पर बातचीत हुई और मैं उन्हें रिसीव करने अगले कोने के रेस्टॉरेंट “कबाब्स एंड करी” की और चल दिया। मैं वहां पहुंचू इससे पहले इस विशाल किरदार से अवगत करा दूँ।34581569_10214845668348554_5288350492345237504_n

जीवन में कुछ लोग ऐसे होतें हैं जिनसे आप चाहे पहली बार मिलिए या एक लाख बार मिल लीजिये , मुलाकात की ऊर्जा का लेवल वही मिलेगा। लगभग एक महीने पहले हम जयपुर को लेकर “जयपुर जानो” नामक एक वीडियो सीरीज पर काम कर रहे थे और इसी के इंटरव्यू के लिए शहर की मशहूर रेडियो जॉकी आर जे देवांगना से वक़्त लिया गया था। सेट पर ही विशाल जी से मिलना हुआ। हेलो से शुभ रात्रि तक के सफर में ये आंकलन कर पाना ज़रा मुश्किल था कि ये हमारी पहली मुलाकात थी। यदि एक कारण दो व्यक्तित्वों की समांतार सोच को भी मान लें तब भी ना जाने ऐसे कितने कारण थे उस छवि से प्रेरित होने के लिए। रेडियो के लिए नेशनल क्रिएटिव हेड की नौकरी के लिए भी उतना ही सामान और सार्थकता जितना सहज रूप से उनकी रूह में शामिल थिएटर के लिए। शब्दों को भी अकसर सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है कि इस वाक्य में हमारा चयन होगा कि नहीं होगा।

इसी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर जयपुर समर फेस्ट में आज “पावर ऑफ़ कंटेंट” जैसे गंभीर विषय पर उनका सेशन था। खैर दो -तीन बार फ़ोन पर रास्ते का स्टेटस जान लेने के बाद वे मेरे सामने थे। उसी एनर्जी के साथ उन्होंने गले लगाया और हम कार्यकर्म स्थल की और आगे बढ़ गए। मेरी समझ में जीवन में सबसे अच्छा आपको तब लगता है जब आपके साथ कुछ भी ऐसा हो रहा हो जो संभावना से परे हो। सेशन के एक घंटे में ऐसा ही कुछ हुआ। जोधपुर में ना होते हुए भी थिएटर के लिए पागलपन से लेकर नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में एडमिशन की विफलता तक मानो सब कुछ सहज हो। पंकज कपूर साहब से लेकर नसीरुद्दीन शाह तक जब भी कोई नाम आया , चेहरे पर विनम्रता और सम्मान जरूर दिखाई दिया। फिल्मों में काम ना मिलने से लेकर आमिर खान साहब के साथ मंच साझा करने तक सब कुछ सहज। एक बारगी आपको लगेगा जैसे कोई क़िस्सागोह अपनी कहानी का संग्रह सुना रहा हो। और वो भी तब , जब उस क़िस्सागोह को किताबें पढ़ने में ज़रा भी रूचि नहीं हो। ज़रा सोचिये आप एक लेखक हैं लेकिन आपको पढ़ना पसंद नहीं है। और ऐसी सो कॉल्ड विकट परिस्थिति में भी आप यदि इतना श्रेष्ठ कंटेंट लिख पा रहें हैं तो जरूर आपका एक एक मिनट पैशन नमक फ़िल्टर से होकर निकलता हैं। इस एक घंटे ने जीवन के अगले कई सौ घंटों की प्रेरणा दे दी थी। सहजता से जीवन जीना भी एक कला है।

और उन्ही के अंदाज़ में कहूं तो कलात्मकता छींक है, आने को अभी आ जाए और ना आये तो कभी नहीं।

पूर्णतः मन से ,

मन ग्रोवर।